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ट्रक ड्राइवर पिता के संघर्ष की कहानी
आपकी पृष्ठभूमि क्या रही है ? और आज आप क्या हो ? इससे भविष्य में मिलने वाली सफलताएँ कदापि बाधित नहीं हो सकती बशर्तें आपका निश्चय अंगद के पाँव की तरह अटल हो । एक आम ड्राइवर के यह दोनों होनहार बेटे अगर कल को देश के सबसे क़ाबिल डॉक्टर व इंजीनियर बनकर उभर जायें तो आश्चर्यचकित मत हो जायेगा । महेन्द्र व श्याम सुन्दर को NEET एंव JEE - ADVANCE में सफल होने की हार्दिक बधाई तथा उनके ट्रक ड्राइवर पिता मगनाराम बिश्नोई के जज़्बे को सलाम । एक पिता जो पिछले एक साल से अपने लाड़लों से नहीं मिल पाया क्योंकि उसके बेटे पढ़ाई के लिए कोटा में रह रहे और वह स्वयं उनकी पढ़ाई व अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए दिन रात ट्रक चलाकर कुछ पैसे जुटाने में लीन रहा है किन्तु आज उस मेहनतकश पिता की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं है उसका सबसे बड़ा सपना अब उसके नौनिहालों ने पुरा कर दिखाया है । उसके दोनों बेटे अब क्रमश : मेडिकल व इंजीनियरिंग की...
संजू आधी सच्ची फ़िल्म की पुरी सच्ची समीक्षा
‘संजू‘ एक शुद्ध आत्मकथात्मक तौर पर मज़बूत फ़िल्म तो नहीं है ... किन्तु भावनात्मक रूप एक अच्छी कहानी ज़रूर है । पिता-पुत्र के रिश्ते को बड़ी बेहत्तरी से दर्शाया है कि नालायक बेटे को ज़िम्मेदार पिता किस तरह सम्भालते रहता है । सभी किरदार दमदार नज़र आते है ... मनीषा कोइराला ने अपनी भाव - भंगिमाओं से नर्गिस दत्त को जीवन्त करने का आंशिक रूप से सफल प्रयास किया है । परेश रावल सुनिल दत्त के अवतार में थोड़ी परिपक्वता दिखाते है किन्तु “ पुत्र ! “ बोलने के लहजे के अलावा उतने अच्छे पंजाबी नहीं बन पाये जितने दत्त साहब थे । विक्की कौशल ने काल्पनिक कहे जा रहे दोस्त कमलेश का किरदार को बख़ूबी निभाकर स्वयं को पुन: साबित किया है ... मैंने तो “राज़ी” भी इसी आदमी को ध्यान में रख कर देखी थी । दिव्या मिर्ज़ा वाक़ई मान्यता के रूप में प्रभावशाली नज़र आती है । रनबीर कपूर ने ज़बरदस्त वापसी की है लम्बे समय से बड़ी हिट का इंतज़ार था अब जाकर पुरा हुआ है । जिस तरह पान सिंह तोमर करने के बाद इरफ़ान बड़े बन गये थे वैसे ही रनबीर ने संजू का किरदार निभा कर खुद में निखार लाने का काम क़िया है । बाक़ी राजू हिरानी की ...
सोशल मीडिया : दिखावे और चाटूकारिता की पराकाष्ठा
आज के इस दौर में हर कोई अपने आप को ग्लोरिफ़ाई करने के काम में लगा हुआ है , लोग बाग़ बिना कुछ परिश्रम किए ही लोकप्रिय हो जाना चाहते है और इस उद्देश्य के लिए वे इस्तेमाल कर रहे है सोशल साइट्स को ... कभी राजनैतिक चर्चा करते हुए तो कभी समाज सेवा करते हुए समय- समय पर इस तरह के अपडेट उनकी तरफ़ से हमें देखने को मिलते रहते है । ऐसे लोगों की तरफ़ से आने वाले सभी पोस्ट में से सबसे वाहियात और नीरस होता है शादी समारोह या सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेते हुए ... बड़े ही मनहूस लगते हो यार तुम , जब गिरते पड़ते जैसे तैसे कहीं पहुँचते हो और आयोजक को अपने बग़ल में खड़ा कर तस्वीर खिंचवाते हो तथा उसे इस कैप्शन के साथ अपडेट करते हो की “ शिरकत होने का सुअवसर मिला ।” मुझे तो इस प्रश्न का जवाब चाहिए कि ऐसा सुअवसर एक ही तरह के व्यक्तियों कैसे मिलता है ? जिनके पास करने के लिए काम ना हो , जो चाटुकारिता में पारंगत हो और जिनके परिवार जन ही उनसे त्रस्त हो ... ! ऐसे महानुभावों का किसी भी में समारोह में पहुँचने से लेकर वहाँ से निकलने तक एक ही उद्येश्य होता है वहाँ आने वाले विशिष्ट अतिथियों , प्रभावशा...